शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

सपना देखते हुए

उस दिन भी वही हुआ 
जो अमूमन रोज होता था
मुझे बस में आखिरकार मिल गई
खिड़की के पास वाली सीट
मैं उस पर पसर गया
और आँखें मूँद कर
तुरंत ही देखने लगा
कोई ऊलजलूल सपना.

उस वक्त सपने में मैंने क्या देखा
यह तो ठीक से याद नहीं
पर यह मुझे अच्छी तरह मालूम है
अपने सपने के भीतर
मैं बड़े एहतियात से मुस्कराया था
कि मेरी मुस्कान का कोई सुराग
किसी को बाहर न मिलने पाए

पर ऐसा हो न सका
और बगल की सीट पर बैठी
एक छोटी –सी बच्ची ने भांप लिया था उसे
और वह खिलखिलाई थी.
इस सलीके से
कि उसके हँसने को
केवल मैं ही सुन पाया था नींद में
और हो उठा था बेतरह असहज
जैसे कोई देख ले किसी को
उसकी निजता के बीच
दर्पण के सामने खड़े होकर
तरह तरह की मुद्राएँ बनाता.

बस चल दीचलती रही
बच्ची कनखियों से मुझे देखती रही
और एक शब्द भी उच्चारित किये बिना
मुझसे कहती रही निरंतर
अंकलदेखो न वही सपना
जिसे देखते हुए आप
इतने खुश थे.

मैं उस नन्ही सी बच्ची को कैसे बताऊँ
सपनों की अपनी परिधि होती है
उसके पार निकल जाने पर
वह धुआं धुआं हो जाते हैं
किसी छलावे की तरह
और फिर कभी लौट कर नहीं आते.
पर मेरी बच्ची यह तो बता 

तुझे किसने सिखाया
सपनों की कूटभाषा को यूं पढ़ लेना ?