शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

लौटने की वजह


मैं उन जगहों पर बार बार लौटना चाहता हूँ
जहाँ छोड़ आया था मैं अपनी कोई न कोई चीज
भूलवश नहीं जानते  बूझते  
जगहों को याद रखने का
यह मेरा इजाद किया तरीका है.

मैं पानागढ़ में अपना बचपन
और कलकत्ते  के परेड ग्राउंड में लगी
क्लाइव की आदमकद मूर्ति के जूते में
छुपा आया था अपनी गुलेल यह सोच कर
यहाँ आऊंगा तो उसकी नाक पर निशाना लगाऊंगा .

मैं छोड़ आया था
भीमताल की झील के बीचों बीच बने टापू पर  
पीताम्बर के ढाबे की कढ़ी चावल का स्वाद
मुझे पता था इसी बहाने उस खूबसूरत घाटी में
आवाजाही की एक जायज़ वजह बनी रहेगी.

मैं शाहजहांपुर को अलविदा कहता हुआ
प्यार का नरम अहसास वहां की उस गली में धर आया था
जहाँ कभी भुवनेश्वर घूमा था
अपनी कहानियों को अंग्रेजी में अनूदित करता
नीम बेखुदी के आलम में.

मैं सहारनपुर से भी ऐसे ही नहीं आया मुहँ मोड़कर
लकड़ी पर नक्काशी करते कारीगरों के हुनरमंद हाथों
और बेहट की अनगढ़ घंटियों की दिव्य आवाज़ के लिए
अपना दिल रख आया था इस उम्मीद के साथ
दिल के  साथ सहारनपुर भी धड़केगा देह में.

मैं दिल्ली से वापस आया तो वहाँ से आ गया समूचा
लगा इसे मेरे जैसों की जरूरत नहीं
वहाँ आने वालों की लंबी कतार लगी  है
यह बेमुरव्वत शहर है जो किसी को याद नहीं रखता
मटकापीर के पेड़ पर टंगे घड़े प्यासों के लिए नहीं है.

मैं दिल्ली के सिवा हर जगह लौट जाना चाहता हूँ
पर पता नहीं बाकी बची इन जगहों में
अब तक मेरे लायक कुछ शेष भी रहा  होगा या नहीं
वक्त के बेरहम कदमों के तले
यादों के सूखे पत्ते  बेहूदा तरीके से चरमराते हैं.

खोया -पाया

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