रविवार, 13 सितंबर 2015

मेरे पास....

मेरे पास छोटे छोटे सपने हैं
या कहूँ ख्वाहिशें
इनके पीछे पीछे दौड़ते
मन तो नहीं भरा 
भर आईं पिंडलियाँ .
देह की होती  है सीमारेखा.
मेरे पास उमंग है
या कहूँ दीवनापन
इसने कभी थकने न दिया
पूरी शिद्दत के साथ जिया
जीने का कोई तयशुदा
प्रारूप नहीं होता.
मेरे पास उतावलापन है
या कहूँ अधैर्य
धीमी राफ्तार वाला घटनाक्रम
खीझ से भर देता है
फास्ट फॉरवर्ड मोड में
आती हैं फर्जी तसल्लियाँ
मेरे पास उत्सुकता है
या कहूँ उम्मीद के चंद कतरे
इनके जरिये कुछ नहीं होता
निराधार बतकही से सिवा
बंद कमरे में बहसियाते कापुरुष
क्रांति के सूत्रधार नहीं होते .
मेरे पास घटाटोप अधेरा हैं
या कहूँ काला चकमक पत्थर
जिसमें से चमक का उठना निश्चित है
अँधेरा जितना सघन होगा
रौशनी उतनी अधिक होगी
कालिमा अधिक देर नहीं टिकती.
मेरे कोई निजी एजेंडा नहीं
या कहूँ खामोख्याली
मेरे भीतर कोई अजायबघर नहीं
न उसमें सजाने लायक कोई सामान
इतिहास रच संरक्षित करने की मूर्खता
मसखरेपन से इतर कुछ नहीं होती
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मुझे पता है

मुझे पता है कि आसमान का रंग नीला है नीलेपन का यह कौन सा शेड है नहीं मालूम किसी बात के कुछ-कुछ पता होने से कुछ नहीं होता लेकिन ...