बुधवार, 23 सितंबर 2015

कुर्सी और आदमी


गहरे भूरे रंग की जिल्द वाली
नई नकोर कुर्सी पर पसर
मुतमईन है वह
अब उसकी आँखें खोज रही हैं
कुर्सी को रखने के लिए
उचित उपयुक्त और निरापद जगह.

कुर्सी का मिल जाना 
एक खूंखार सपने की शुरुवात है
वह कुर्सी के पीठ पर टंगे तौलिये से
पोंछता  जा रहा है हाथ
रंगे हाथों पकड़े जाने का अब कोई खौफ नहीं.

कुर्सी में लगे है पहियें
घूमने की तकनीक से है लैस
वह उसके हत्थे को कस कर थामे है
उसे पता है कि कुर्सियां
अमूमन स्वामिभक्त नहीं होती. 

कुर्सी पर मौका ताड़कर पसर जाना तो 
फिर भी है काफी आसान
लेकिन बड़ा जटिल है
उसे अपने लायक बनाना
बड़ा मुश्किल है कुर्सी को
घोड़े की तरह सधा लेना.

कुर्सी पर बैठते ही आदमी
घिर जाता है उसके छिन जाने से जुड़ी
तमाम तरह की आशंकाओं से
इस पर एक बार बैठ जाने के बाद
वह वैसा नहीं रह पाता
जैसा कभी वह था नया नकोर. 

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